मंगलवार

संपन्न हुआ बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का पन्द्रहवाँ राज्य सम्मलेन



* राजनीति को मनुष्य के पक्ष में काम करने की जरुरत है-  डॉ. विभूति नारायण राय  (पूर्व कुलपति)
* इतिहास को विज्ञान की कसौटी पर लिखा जाना चाहिए- प्रो. अली जावेद (प्रलेस महासचिव)
* साहित्य का श्रोत जनता ही है- डॉ. खगेन्द्र ठाकुर (वरिष्ठ आलोचक)
* प्रतिरोध की संस्कृति को कुशलतापूर्वक तर्कजाल से कमजोर बनाने की चल रही है साजिश -  राजेन्द्र राजन (महासचिव बिहार प्रलेस)

बिहार के लखीसराय में संपन्न  हुआ बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का  दो दिवसीय राज्य सम्मलेन। सम्मलेन के मुख्य अतिथि बिभूति नारायण राय (पूर्व  कुलपति महात्मागांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा.)  ने कि हम साहित्य को समाज से जोड़कर देखते हैं. पिछ्ला सौ वर्ष असाधारण समय रहा. दुनिया में नास्तिकता चौथे सबसे बड़े धर्म के रूप में उभरा है.. पहले ईश्वर निर्विरोध होते थे. पिछले सौ वर्षों में ईश्वर के साथ-साथ परिवार को भी चुनौती मिली है. आज दुनिया के बहुत से देशों में समलैंगिकता को मान्यता मिल रही है कुछ वर्ष पहले जिसे स्वीकारा नहीं जाता था उसे स्वीकारा जा रहा  है...  संस्थाएं बनाना कठिन होता है उसे तोड़ना आसान।  बड़े सपने देखना राज्यविरोधी हो रहा है। राजनीति को मनुष्य के पक्ष में काम करने की जरुरत है.
वरिष्ठ आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने 09 अप्रैल की ऐतिहासिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि आज के दिन ही लखनऊ में प्रेमचंद और सज्जाद ज़हीर ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की थी। पं.  राहुल सांकृत्यायन का जन्म दिवस भी आज ही है..
  
प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. अली जावेद ने कहा की इतिहास को वैज्ञानिकता की कसौटी पर लिखा जाना चाहिए - इस्लाम में इस बात की पाबंदी कि औरतें अपना चेहरा ढ़क कर रखे.. राम के नाम पर  लोगों को गुमराह किया जाता है। प्रलेस उस परम्परा को मानता है जिसमें सूर, तुलसी, मीर और ग़ालिब एक चश्में से देखा जाय। 
  बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव राजेन्द्र राजन ने अपने प्रतिवेदन में कहा कि आज वैश्विक पूंजी देश के कारपोरेट पूंजी के साथ सहमेल बनाकर उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ा रही है जिससे मनुष्य बाजार  में बिकनेवाला माल बन गया है। आज आप बौद्धिक प्रतिभासम्पन्न हैं लेकिन बाजार में बिकाऊ माल नहीं बन सकते तो आपकी कोई कीमत नहीं है। मनुष्य और मनुष्यता की जगह अर्थ ने अनर्थकारी स्थान हासिल कर लिया है। आज पद, पैसे, सुख एवं ऐश्वर्य के  के चुम्बकीय शक्ति से कमजोर होने वाले खासकर नामधारी एवं पदधारी लेखकों की संख्या काम नहीं है।  ऐसे होशियार लेखक छद्म  क्रांतिकारी बनाने  के लिए संगठन को लिवास की तरह धारण करते हैं।  वे प्रतिरोध की संस्कृति को कुशलतापूर्वक तर्कजाल से  कमजोर बनाते हैं।
सम्मलेन में आये प्रतिनिधियों एवं अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रो. विजयेंद्र नारायण सिंह ने कहा कि हम तमाम साहित्यप्रेमियों का शुक्रगुजार हैं आपने लखीसराय जैसे छोटे जिले को आतिथ्य करने का अवसर प्रदान किया। यह धरती राहुल सांकृत्यायन, पं जगन्नाथ चतुर्वेदी, डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, बाबा नागार्जुन, रामधारी सिंह दिनकर आदि का प्रभाव क्षेत्र रहा है।  आचार्य विनोबा भावे, आचार्य नरेंद्र देव, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद आदि कर्मयोगी का भी प्रभाव क्षेत्र रहा है।  मगही कवि मथुरा प्रसाद नवीन, साहित्यकार कुमार विमल, श्री नंदन शास्त्री एवं अख्तर उरैनवी की तो जन्म एवं कर्मस्थली ही है, जिन्होंने भाषा साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया है। 
बिहार प्रलेस के अध्यक्ष डॉ. ब्रजकुमार पाण्डेय एवं कॉ. सत्यनारायण सिंह ने प्रलेस की भूमिका पर प्रकाश डाला।
इस अवसर पर अतिथि साहित्यकारों ने बिहार प्रलेस की पत्रिका 'रोशनाई' एवं 'दखल' का लोकार्पण भी किया।  
 संध्याकालीन सत्र में 'सांस्कृतिक यात्रा' के अंतर्गत राहुल सांकृत्यायन  विचार 'भागो नहीं  दुनिया को बदलो'  शीर्षक बैनर तले राज्य के विभिन्न हिस्से से आए  साहित्यकार एवं रंगकर्मियों ने नगर में भ्रमण किया। 
सम्मलेन में सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल पतंग का एकल नाट्य 'डेविड की डायरी' का मंचन किया गया तत्पश्चात जमुई जिला प्रलेस की ओर से ईशा और साक्षी कुमारी ने नृत्य पेश किया। सत्र का संचालन अरविन्द श्रीवास्तव ने किया ।
सम्मलेन के प्रथम दिवस का महत्वपूर्ण सत्र 'कवि सम्मलेन' था, कवि शहंशाह आलम की अध्यक्षा एवं राजकिशोर राजन के संचालन में दर्जनों कवियों  ने अपनी कविता का पाठ किया बक्सर से पधारे कुमार नयन ने सुनाया - खौलते पानी में डाला जाएगा, यूँ हमें धोया  खंगाला जाएगा, लुटाने में लड़ पड़े आपस में हम, इस तरह सिक्का उछाला जाएगा।
जमुई के शायर पैगाम सादिक ने कहा - तुम सजा तो देते हो हौसला नहीं देते , आजतक न जाने किस कसमकस में है मुंसिफ, बहस रोज सुनते फैसला नहीं देते।  ए. दिव्या ने सुनाया - वो कैसी फिजां होती, वो कैसा जहां होता, मैं होती बेगम मुमताज, तू मेरा शाहजहाँ होता।  पूर्णिया से नूतन आनंद ने अपनी -साइकिल चलाती लडकी , बक्सर के शशांक शेखर ने जलाते शहर को देखकर, पटना के श्रवण कुमार ने - माँ शीर्षक कविता का पाठ किया। कवियों में अरुण हरलीवाल (गया) , विभूति कुमार(पटना), कुमार  विजय गुप्त ( मुंगेर), गंगादयाल सिंह (गोपालगंज), राजेन्द्र राज (सूर्यगढ़ा), सौरभ शाण्डिल्य(गया), सुधाकर राजेन्द्र (जहानाबाद) , उमेश पंडित उत्पल(पूर्णिया), सुरेन्द्र भारती (त्रिवेणीगंज), शशिबाला रानी (लखीसराय) , अरविन्द श्रीवास्तव (मधेपुरा)  आदि ने अपनी-अपनी  कविताओं का पाठ किया।
सम्लेन के दूसरे दिन 'प्रगतिशील आंदोलन परम्परा और चुनौतियाँ' विषयक सेमीनार में  विषय प्रवेश करते हुए आरा से पधारे प्रो. रवीन्द्रनाथ राय ने कहा कि प्रगतिशीलता का प्रथम बीज कबीर ने डाला था।  प्रेमचंद सौंदर्य को श्रमिकों के पास ले जाना चाहते थे। सदगत, ठाकुर  का कुआं , पूस की रात में जो शोषित वर्ग थे वे प्रेमचंद के नायक बने।  निराला ने अपने प्रतिरोध की मशाल को जलाए रखा।  बिहार के लेखकों को भी प्रेमचंद जागृत करते रहे।  सज्जाद जाहिर, मुल्कराज आनंद और प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ की नींव रखी।  जब सोज़ेवतन 1909 में प्रकाशित  हुआ सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। फैज पाकिस्तान की जेलों में वर्षों बंद रहे।  प्रगतिशील आंदोलन नें प्रतिरोध को शक्ति दी। आज हम देखते हैं कि इतिहास और मिथक को एक बताया जा रहा है।
उप्र प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव डॉ. संजय श्रीवास्तव ने प्रगतिशील आंदोलन की भूमिका एवं लेखकों की प्रतिवद्धता को रेखांकित किया।  डॉ शचीन्द्र महतो ने कहाकि हमारी महान परम्परा हमें चेतावनी देती है…
प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. अली जावेद  ने स्पष्ट कियाकि तसलीमा नसरीन हो या  सलमान रुश्दी  हम किसी पर अंकुश लगाने का विरोध करते हैं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के गलाघोंटने का विरोध करते हैं.. लेकिन वे हमारे आदर्श नहीं हैं.. हम लेखन के जरिए वैज्ञानिक सोच बढ़ाने की बात करते हैं धर्म को हथियार बनाकर सत्ता हासिल करना गलत मानते हैं।
इस सत्र की अध्यक्षा करते हुए डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने कहाकि साहित्य का श्रोत जनता ही है… आधुनिक युग चेतना के प्रवर्तक भारतेंदु थे, भारतेंदु ने समाज के नए लक्षण को पहचाना..  हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हमें अपने समय को पहचानना चाहिए।  आज समाज में उनका वर्चस्व बढ़ रहा है जो प्रगतिशीलता के विरोधी हैं जनतंत्र के विरोधी हैं…
 

 सम्मलेन में जिला इकाईयों  द्वारा लगाया गया कविता-पोस्टर, पुस्तक प्रदर्शनी आदि भी आकर्षण में रहे. इस  यादगार  आयोजन के लिए प्रतिभागियों ने लखीसराय की जनता का आभार व्यक्त किया।
                                            - अरविन्द श्रीवास्तव / मधेपुरा

                                                          
राज्य मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता
बिहार प्रगतिशील लेखक संघ
मोबाइल- 9431080862

गुरुवार

मुक्तिबोध के बाद गुम हुई ऊर्जा की तलाश है विमल कुमार की कविता…


मुक्तिबोध के बाद की हिन्दी कविता में जो ओज, जो ऊर्जा, जो संभावना दिखाई देती है, वह आठवें दशक के बाद की हिंदी कविता में मुझे दिखाई नहीं देती। परंतु आठवें दशक के बाद जिन कवियों ने हिंदी कविता की चमक को बचाए रखा है उन कवियों में कवि विमल कुमार भी हैं. यह वक्तव्य वरिष्ठ आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर 'बिहार प्रगतिशील लेखक संघ'  द्वारा आयोजित दिल्ली से पधारे कवि विमल कुमार की प्रतिरोधी कविताओं के  पाठ के समय दिया। यह काव्य-पाठ कवि रैदास  जी के जन्म-दिवस को समर्पित था। पटना के जनशक्ति भवन में इस एकल काव्य-पाठ की अध्यक्षता डॉ.  खगेन्द्र ठाकुर ने की तथा संचालन कवि शहंशाह आलम ने किया।
     इस अवसर पर कवि विमल कुमार ने अपनी बीसियों कविता का पाठ किया।  उन्होंने सत्ता की खामियों और सरकार की नाकामियों पर जम कर प्रहार किया। उन्होंने अपनी कविता में कहा - ऐसा वक्त आ गया है कि अब तुम हत्यारे को हत्यारा नहीं कह सकते… होनी ही चाहिए बहस/ लोकतंत्र में रवि बाबू / होनी ही चाहिए / नहीं किया जा सकता इससे इंकार। उन्होंने एक जलाते हुए शहर की यात्रा, बूढ़ी स्त्री के लिए अपील, पानी का दुखड़ा, मुक्ति का इंतजार, सबसे ताकतवर आदमी शीर्षक द्वारा बाज़ारवाद और एक ध्रुवीय विश्व को आड़े हाथ लिया। काव्य-पाठ में 'डिजिटल इंडिया' से  जुडी उनकी कविता -
न मैं गांधी के मुल्क में रहता हूँ / न मैं बुद्ध के देश में रहता हूँ / मेरे घर का पता बदल गया है यारों/ मैं अब डिजिटल इंडिया में रहता हूँ ..। इस कविता को श्रोताओं ने खूब सराहा


  समापन वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने कहा कि विमल कुमार की कविताओं में सत्ता का विरोध भाव बना हुआ है। इन्होंने सत्ता से कभी समझौता नहीं किया है। संचालन करते हुए कवि शहंशाह आलम ने कहा कि विमल कुमार का संग्रह  'अंधेरे में एक औरत से बातचीत' आज भी मेरी प्रिय कविता पुस्तक में शामिल है। इस कविता पर उन्हें प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल सम्मान भी मिला है। कवि की 'पानी का टुकड़ा' भी पठनीय है..
इस  अवसर पर वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा, वरिष्ठ कथाकार अवधेश प्रीत, प्रेम कुमार मणि, संतोष दीक्षित, कवि अरविन्द श्रीवास्तव, संजय कुमार कुंदन, राकेश प्रियदर्शी, गणेश जी बागी रंगकर्मी अनीश अंकुर एवं बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव राजेन्द्र राजन आदि उपस्थित थे। धन्यवाद-ज्ञापन सुमंत ने किया। 

काव्य- पाठ का समापन पटना के वरिष्ठ फोटोग्राफर कृष्ण मुरारी किशन के निधन पर शोक - संवेदना व्यक्त करने के बाद किया गया।  

सोमवार

जिस जनतंत्र के नाम पर समाजवाद को गुडबाय किया गया वह सफल नहीं हुआ- डा. खगेन्द्र ठाकुर





- मिस्र में जनता सावधान है, राष्ट्रपति के खिलाफ है।
- रूस के बाजार में भी चीन घुसा हुआ है।
- वियतनाम, इराक से अमरीकी गये पूरे नाश करके गये।
- लोट्स पत्रिका का पुनः प्रकाशन वियतनाम के रचनाकार करेंगे।

  बिहार प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से वरिष्ठ आलोचक डा. खगेन्द्र ठाकुर को उनकी पछत्तरहवीं  वर्षगंठ के अवसर पर एक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इस मौके पर उन्होंने अपनी काहिरा (मिस्र) यात्रा के अनुभव सुनाये। डा. ठाकुर ने यात्रा वृतांत सुनाते हुए कहा कि वहां ‘एफ्रो एशियाई राइटर्स यूनियन’ की तरफ से हम गये थे । वहां बीस देशों के साथी आये थे। वहां मिस्त्र में आजादी के बाद काफी परिर्वतन हुए हैं। कॊमनवेल्थ से मिस्त्र अलग रहा जिसके कारण वहाँ अंग्रेजी  भाषा का वर्चस्व समाप्त हो गया। क्रिकेट की जगह फुटबाल में लोगों की दिलचस्पी है। साथ ही कई अन्य परिवर्तन स्पष्ट परिलक्षित होते हैं। डा. ठाकुर ने आगे कहा कि वहाँ आज परिर्वतन की हवा तेज बह रही है। उस हवा को भारत में भी बहनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की तरह वहाँ वर्गभेद दिखाई नहीं देता जबकि वहाँ की सभ्यता पाँच हजार साल पुरानी है। 
इस अवसर पर बिहार प्रलेस के अध्यक्ष डा. ब्रज कुमार पाण्डेय ने डा. खगेन्द्र ठाकुर के बहुआयामी पक्ष पर प्रकाश डाला। उन्होंने श्री ठाकुर को एक लेखक के अलावा द्रष्टा, चिंतक और आचार्य भी कहा।
      इस अवसर पर डा. खगेन्द्र ठाकुर को पुष्प गुच्छ और अंगवस्त्र देकर सम्मानित भी किया गया। 
डा. ठाकुर ने यात्रा वृतांत के क्रम में लिखी अपनी दो कविताएं - ’हवाई अठ्ठा’ एवं ’पिरामिड’ का पाठ किया।
कार्यक्रम में आरा से प्रकाशित ‘देशज’ एवं खगडि़या से प्रकाशित ‘अवाम’ पत्रिका के नये अंको का लोकार्पण भी किया गया। 
केदार भवन, अमरनाथ रोड के सभागार  में आयोजित इस कार्यक्रम में बिहार के विभिन्न जिलों और क्षेत्रों से आये लेखकों, कलाकर्मियों, सांस्कृतिकर्मियों की भारी भीड़ थी। कार्यक्रम को बिहार प्रलेस के महासचिव राजेन्द्र राजन कथाकार संतोष दीक्षित, कवयत्री पूनम सिंह, रानी श्रीवास्तव, कवि शहंशाह आलम, अरविन्द श्रीवास्तव, राजकिशोर राजन, अरुण शीतांश, रमेश ऋतंभर, डा. धर्मेन्द्र कुंवर, जनार्दन मिश्र, दशरथ प्रजापति, कृष्ण कुमार, विभूति कुमार, संतोष श्रेयांश, रामयतन यादव , महेन्द्र नारायण पंकज आदि ने भी संबोधित किया तथा विभिन्न जिले से आए प्रतिनिधियों ने जिला का प्रतिवेदन पढा। 
- अरविन्द श्रीवास्तव 
बिहार प्रलेस मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता

शुक्रवार

डा. रामविलास शर्मा की जन्मशती पर डा. खगेन्द्र ठाकुर का व्याख्यान- सह कार्यसमिति की बैठक


*  हिन्दी जनता की भाषा है।
*  संस्कृति का निर्माता वह है जो मेहनत करता है।
*  किताबों को पढ़कर हम अपने समय की समस्या का हल निकाल सकते हैं।
   
    बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में केदार भवन, पटना के सभागार में डा. रामविलास शर्मा की जन्मशती के अवसर पर डा. व्रजकुमार पाण्डेय की अध्यक्षता में एक व्याख्यान का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता डा. खगेन्द्र ठाकुर ने इस मौके पर विस्तार पूर्वक डा. रामविलास शर्मा से जुड़े प्रसंग तथा उनके जीवन एवं कृतित्व पर बोलते हुए कहाकि डा. शर्मा का लेखन कविता से लेकर आलोचना, इतिहास, दर्शन तथा भाषा विज्ञान तक फैला हुआ है। राहुल सांकृत्यायन के बाद किसी ने भी इतना काम नहीं किया, जितना डा. रामविलास शर्मा ने। उन्होंने भारतीय संस्कृति के विकास में हिन्दी जाति की भूमिका और हिन्दी नवजागरण की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। डा. ठाकुर ने कहा कि आज के प्रगतिशील आन्दोलन व राष्ट्रीय जागरण अभियान में डा. रामविलास शर्मा का योगदान प्रमुख रहा है। उन्होंने भारतेन्दु, प्रेमचंद, रामचंद्र शुक्ल और निराला पर काफी लिखा। डा. ठाकुर ने कहा कि ‘ मनुष्य ने जब भाषा प्राप्त कर ली तो उसकी सर्जनात्मक क्षमता बढ गयी’ ऐसा रामविलास शर्मा मानते थे, आग जहाँ है वहाँ सूरज के डूबने के बाद भी रौशनी आती है... आग और फिर भाषा ने मानव सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डा. खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि डा. रामविलास शर्मा का प्रारंभिक जीवन कविता से शुरू हुआ। अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तारसप्तक’ के वे कवि थे। उनके संग्रह ‘रूप तरंग’ नाम से छपे थे। डा. शर्मा ने भाषा विज्ञान पर कई पुस्तकें लिखी, पहली बार यह विज्ञान ग्रियर्सन और सुमिति कुमार चटर्जी के दायरे से बाहर निकला। आर्य और द्रविड़ भाषा में कितना संबन्ध है इसे भी डा. शर्मा ने रेखांकित किया हैं... केदारनाथ अग्रवाल उनके प्रिय कवि थे। डा. खगेन्द्र ठाकुर ने रामविलास शर्मा के कई संस्मरणों को सुनाया एवं उनके साथ  बिताये क्षणों को स्मरण कर उन्हें नमन किया।
    कार्यक्रम के अध्यक्ष डा. व्रजकुमार पाण्डेय ने अपने विचारों को रखते हुए कहा कि डा. रामविलास शर्मा का इतिहास लेखन में प्रवेश न संयोग की बात है , न अनधिकार प्रयास है। डी. डी. कौशाम्बी एक महान गणितज्ञ होते हुए भी उन्होंने भारतीय इतिहास में माक्र्सवादी विचारधारा का प्रवेश कराया। जिसका विकास आगे चलकर भारतीय इतिहास लेखन पर पड़ा। डा. रामविलास शर्मा ने 1857 के मुक्ति आंदोलन पर जो किताब लिखी है व अन्य लोगों द्वारा लिखी गई  किताबों में श्रेष्ठ मानी गई है।
    बिहार प्रलेस के महासचिव राजेन्द्र राजन ने कहा कि आज के सामयिक परिस्थिति पर रामविलास जी ने बहुत कुछ लिखा है। डा. शर्मा की इतिहास दृष्टि जिस प्रगतिशील चेतना के साथ हमारे समक्ष आती है, वह काबिले-तारीफ है।
    इस अवसर पर कवि शहंशाह आलम, अरविन्द श्रीवास्तव, राजकिशोर राजन, अरुण शीतांश, डा.पूनम सिंह, रवीन्द्रनाथ राय, देव आनंद, सुरेन्द्र भारती, डा. रानी श्रीवास्तव, विभूति नारायण सिंह, महेन्द्र नारायण ‘पंकज’, के.के. गिरी ‘शाद’ आदि ने भी अपने-अपने विचारों को व्यक्त किया।
       

बुधवार

बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का दो दिवसीय 14वाँ राज्य सम्मेलन, ‘रेणु’ की धरती पर साहित्यकारों का समागम।

बांये से- विनीताभ, डा. दीपक राय, पूनम सिंह, राजेन्द्र राजन, डा. व्रजकुमार पाण्डेय, डा. अली जावेद, विनीत तिवारी और अमिताभ चक्रवर्ती

- साहित्य की मुख्यधारा प्रगतिवाद है!
- नवसाम्राज्यवाद के खतरे से दुनिया को बचाने का संकल्प!
- लेखक ही अगुवा बनकर समाज को रौशनी दिखायेगा!
- आन्दोलन की कमान युवा पीढ़ी सम्भाले!

    बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का 14 वाँ राज्य सम्मेलन पूर्णिया के कमला प्रसाद  नगर (कला भवन) में 11 एवं 12 फरवरी को सम्पन्न हुआ। कलम से दुनिया की जंग जीतने के आगाज एवं युवा रचनाकारों की पुरजोर भागीदारी के साथ चर्चित साहित्यकारों की उत्साहपूर्ण उपस्थिति ने कार्यक्रम को एतिहासिक बना दिया। वरिष्ठ आलोचक एवं बीएचयू के पूर्व आचार्य डा. चौथीराम यादव, प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. अली जावेद, म.प्र. प्रलेस के महासचिव विनित तिवारी, कथाकार पुन्नी सिंह, बांग्ला कवि एव बंगाल प्रलेस के महासचिव अमिताभ चक्रवर्ती, उ.प्र प्रलेस के महासचिव संजय श्रीवास्तव सहित बिहार संगठन के अध्यक्ष डा. व्रजकुमार पाण्डेय, महासचिव राजेन्द्र राजन एवं उपाध्यक्ष डा.पुनम सिंह व राज्य के विभिन्न जनपदों से आये रचनाकर्मी प्रतिनिधियों ने इस क्षेत्र के प्रतिष्ठित लेखक-कथाकारों यथा बंगला के मूर्धन्य साहित्यकार सतीनाथ भादुड़ी, उपन्यासकार एवं आंचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु, अनूपलाल मंडल आदि की समृद्ध विरासत को स्मरण व नमन किया।
    14 वें राज्य सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव डा. अली जावेद ने कहा कि हम महान साहित्यकारों - टैगोर, प्रेमचंद, फै़ज,  नागार्जुन, केदार, रेणु आदि की जयन्ती इसलिए मनाते हैं कि हम उनसे प्रेरणा लें, लेकिन पूर्वजों की उपलब्धियों पर हम कबतक अपनी पीठ थपथपाते रहेंगे। आखिर कब हमारी लेखनी का दम बदलाव ला पाएगा। उन्होंने कहा कि परंपराओं का नया रूख कायम करते हुए यह बताना जरूरी हो गया है कि साहित्य पिछलग्गु नहीं बल्कि समाज के निर्माण में अग्रणी पंक्ति का योद्धा है।
कार्यक्रम का शुभारम्भ करते हुए बिहार प्रलेस के महासचिव राजेन्द्र राजन ने कहा कि हम महान कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु एवं सतीनाथ भादुड़ी की धरती पर आकर गौरवान्वित महसूसते हैं। श्री राजन द्वारा व्यक्त उद्गार के पश्चात इस राज्य सम्मेलन पर केन्द्रित स्मारिका का विमोचन किया गया। स्वागत भाषण में डा. जयकृष्ण मेहता ने अपने स्वागत संबोधन में पूर्णिया की समृद्ध साहित्यिक एव सांस्कृतिक परंपरा को रेखांकित  किया। राजेन्द्र राजन ने अपने वक्तव्य में कहा कि - मैं उत्सवधर्मी नहीं हूँ बल्कि अतीत में जो सपने संजोये गये हैं वे आजतक साकार नहीं हो पाये। सत्ताधारियों को गरीब-फटेहाल लोगों की चिंता नहीं है... किसान आत्महत्या कर रहे हैं, बेरोजगारों की फौज खड़ी हो रही है, महानगर ही नहीं गांव की गलियाँ भी विदेशी सामानों से भरी पटी है, राजनीतिज्ञों के नाम से लोगों को शर्म आती है ... श्री राजन ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए उन्होंने उपभोक्तावादी संस्कृति, मंहगी शिक्षा व्यवस्था और पुस्तकों से पाठकों को दूर करने की साजिश को बेनकाव करने की बात कही।
    मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव विनीत तिवारी ने ब्रेख्त की कविता से अपना वक्तव्य प्रारंभ किया, उन्होंने कहा कि चुनौतियाँ भी बदली, ताकते भी बदली है... लोकतंत्र का अर्थ अपने में तबतक सार्थक नहीं है जबतक उसमें समाजवाद का सामंजस्य न हो। बिहार प्रलेस की उपाध्यक्ष डा. पूनम सिंह ने वैश्विकरण व बाजारवाद के खतरे पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने लेखकों से अपना पक्ष सामने लाने की बात कही, उन्होंने अपनी कविता ‘उन्हें पसंद नहीं’ के माध्यम से समय में व्याप्त जड़ता एवं असमानता को रेखांकित किया। बिहार प्रलेस के अध्यक्ष डा. व्रजकुमार पाण्डेय ने वैश्विक संकट  में लेखकों का दायित्व क्या हो - पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साम्रज्यवाद का नया रूप  पहले ब्रिटिश माडल का था, अब अमरीकी साम्राज्यवाद का है। वह व्रिटेन से अलग है इसमें एक देश में बैठकर पूरी दुनिया को डंडे से हांकना है। भूमंडलीयकरण की नीतियाँ देश से हटाये बगैर कल्याण नहीं हो सकता... लेखक ही अगुवा बनकर समाज को रौशनी दिखाएगा। इस अवसर पर कोलकता से पधारे अमिताभ चक्रवर्ती ने बंगला में अपने विचार व्यक्त किए। प्रसिद्ध आलोचक डा. चौथी राम यादव ने ‘आज का वैश्विक संकट, भारतीय संदर्भ में’ विषय पर बोलते हुए कहा कि आज संकट आर्थिक ही नहीं सामाजिक संकट भी है। उन्होंने कबीर के ‘घर’ की व्याख्या करते हुए कहा कि हमारे देश में झगड़ा विषमताओं से भरा है उसे कबीर जलाने की बात करता है। उन्होंने कबीर के ‘बाजार’ और आज के बाजार में अन्तर स्पष्ट करते हुए कहा कि - आज का बाजार उपभोक्तावादी बाजार है। आदमी स्वयं बाजार में खड़ा है, मनुष्य की मनुष्यता को कैसे बचाया जाय? आदमी की पहचान आज उसके धन और जाति पर की जाती है। जिस समाजवादी विकल्प के रूप में पूंजीवादी व्यवस्था को रखा गया उसमें भाईचारा, समता आदि का अंत हो गया है। पूर्वी यूरोप व सोवियत संघ का जो विघटन हुआ  इससे समाजवाद व माक्र्सवाद खत्म नहीं हुआ। उन देशों में माक्र्स का ‘दास कैपिटल’ फिर से पढ़ा जा रहा है ...। कथाकार पुन्नी सिंह ने पूंजीवादी व्यवस्था के दुश्परिणाम को ‘फिरोजावाद के चूड़ी उद्योग’ के संदर्भ में व्याख्या की। उ.प्र. प्रलेस के महासचिव डा. संजय श्रीवास्तव ने कहा कि प्रगतिशील लेखक संघ एक दफ़्तर या कार्यालय नहीं है, यह एक आंदोलन है। उन्होंने  कहा कि प्रलेस की जिम्मेदारी बनती है कि उसे बेनकाव करें जो साहित्य में राजनीति और पूंजीवाद को स्थापित कर रहे हैं...। वक्ताओं में डा. दीपक राय ने ‘वर्तमान विश्व परिदृश्य और लेखकीय प्रतिबद्धताएं’ पर अपना आलेख पाढ़ किया। मंचसंचालन रंगकर्मी नूतन आनंद ने किया।
    कार्यक्रम के प्रथम सत्र में  प्रलेस के तीन पुराने पुरोधा साथियों - त्रिवेणी शर्मा ‘सुधाकर’, डा. व्रजकुमार पाण्डेय एवं डा. खगेन्द्र ठाकुर (अनुपस्थिति में) को अंगवस्त्र से सम्मानित किया गया। यह एक ऐतिहासिक क्षण था।
    समारोह का एक विशेष आकर्षण प्रथम दिवस के अंतिम सत्र में सर्वभाषा कवि-सम्मेलन’ का रहा, विशिष्ठ अतिथि एवं कवि अमिताभ चक्रवर्ती (कोलकता)  एवं पूनम सिंह की अध्यक्षता व अरविन्द श्रीवास्तव के संचालन में लगभग चालीस कवियों ने अपनी-अपनी कविताओं का पाठ किया जिनमें- सर्वश्री रमेश ऋतंभर, डा. पुष्पा गुप्ता, मीनाक्षी मीनल (मुजफ्फरपुर) अनिल पतंग, विनिताभ (बेगूसराय) अरुण हरलिवाल, कृष्ण कुमार (गया), विश्वनाथ (खगडि़या) बांग्ला कवि आलो राय, डा. मनोज (पूर्णिया), अरुण शीतांश, संतोष श्रेयांश (आरा), अरविन्द ठाकुर, सुरेन्द्र भारती, रघुनाथ मुखिया, प्रतिभा कुमारी (सुपौल) दशरथ प्रजापति, तनवीर मौलानगरी (सीतामढ़ी), शशांक शेखर (बक्सर) सागर आनंद (जहानाबाद) आदि प्रमुख थे।  
    समारोह के दूसरे दिन बिहार प्रलेस के महासचिव राजेन्द्र राजन ने   प्रलेस की 75 वीं वर्षगांठ पर लखनऊ में आयोजित सम्मेलन को स्मरण करते हुए - युवा पीढ़ी की सार्थक भागीदारी पर संतोष व्यक्त किया। श्री राजन ने राज्य का प्रतिवेदन पढ़ा। साथ ही राज्य के विभिन्न जनपदों  से आये प्रतिनिधियों ने अपने-अपने प्रतिवेदन द्वारा विमर्श को आगे बढ़ाया।
    समारोह में इप्टा कलाकर दिलीप कुमार राय द्वारा दुष्यंत की गज़ल, गोपाल सिंह ‘नेपाली’ एवं नीरज के गीत व कैफी साहब की नज़्म का गायन ने भी कार्यक्रम को यादगार बना दिया। ‘अभिधा प्रकाशन’ के सौजन्य से लगा ‘बुक स्टाल’ भी आकर्षण का केन्द्र था।  इस सम्पूर्ण अविस्मरणीय कार्यक्रम के आयोजक सुप्रसिद्ध रंगकर्मी देवानन्द एवं नूतन आनंद के प्रति सहभागियों ने कृतज्ञता व्यक्त की।